अहंकार रूपी दानव हमारा सबसे प्रबल शत्रु :डॉ.उमेशचन्द्र शर्मा
श्रीमद्भागवत कथा में राजा परीक्षित व हिरण्याक्ष के प्रसंग से समझाया अहंकार का परिणाम
मनोज उपाध्याय,
थांदला,झाबुआ। मध्यप्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के अनुविभागीय मुख्यालय थांदला में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अंतर्गत आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह महोत्सव के चौथे दिन सोमवार को स्थानीय श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर सभागार में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा के दौरान डॉ.उमेशचन्द्र शर्मा ने अहंकार को मनुष्य का सबसे प्रबल शत्रु बताते हुए कहा कि अहंकार रूपी दानव मानव जीवन की आध्यात्मिक यात्रा के साथ-साथ उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है तथा अंततः मनुष्य के पतन का कारण बन जाता है,डॉ.शर्मा ने श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित
राजा परीक्षित को मिले शाप का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि राजमद के कारण राजा परीक्षित को ध्यानयोगी एवं तपोनिष्ठ शमीक मुनि भी ढोंगी दिखाई देने लगे।अहंकारवश उन्होंने ध्यानस्थ ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया।इस कृत्य के परिणामस्वरूप ऋषि पुत्र श्रृंगी के शाप का उन्हें सामना करना पड़ा और अंततः उनका जीवन मृत्यु की ओर अग्रसर हुआ।उन्होंने हिरण्याक्ष वध का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि अपने बल के अहंकार में चूर दैत्यराज हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया था। देवी पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराने भगवान श्रीहरि विष्णु ने वाराह रूप धारण किया। हिरण्याक्ष ने भगवान वाराह को भी चुनौती दी, लेकिन भगवान ने उसके
अहंकार का नाश कर उसका वध कर दिया।डॉ.शर्मा ने कहा कि पौराणिक आख्यानों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं,जहां अहंकार के वशीभूत होकर मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व तक को नकारने लगता है।अहंकार मनुष्य के मन को छल-कपट और विकारों से भर देता है। ऐसे कलुषित मन में भगवान का वास नहीं हो सकता।ईश्वर की अनुभूति प्रेमपूर्ण,सरल और निर्मल हृदय में ही होती है।उन्होंने कहा कि मनुष्य के लिए मन ही बंधन और मोक्ष दोनों का कारण है।इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति अहंकार का त्याग कर ईश्वर की शरण में जाए और अपने मन को विकारों से बचाने का निरंतर प्रयास करे।सभी के प्रति दयाभाव रखते हुए स्वभाव को सरल बनाना और किसी के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखना चाहिए।डॉ.शर्मा ने हनुमान चालीसा की चौपाई “राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा” का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान के नाम रूपी रसायन से ही मनुष्य का मन निर्मल होता है।उन्होंने कहा कि श्रीराम,श्रीकृष्ण, भगवान शिव अथवा मां दुर्गा का नाम श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से मन को शांति और निर्मलता प्राप्त होती है।श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने भी भगवान नाम संकीर्तन को भगवत्प्राप्ति का सरल साधन बताया।उन्होंने श्रद्धालुओं से साधु संग,भगवान की लीलाओं का श्रवण,कीर्तन एवं स्मरण करने के साथ भक्ति,योग और वैराग्य के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि सभी देहधारियों के प्रति दया भाव रखें, सबका हित चाहें और हर परिस्थिति में शांत बने रहें।भगवत्प्राप्ति के विभिन्न साधनों में श्रीहरि की भक्ति के समान अन्य कोई मंगलमय मार्ग नहीं है।चौथे दिन की कथा में भगवान के लीला अवतारों,सृष्टिक्रम वर्णन,अश्वत्थामा के मानमर्दन,वाराह अवतार,भीष्म स्तुति एवं हिरण्याक्ष उद्धार सहित विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वाचन किया गया।

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