*कोदली में वनवासी बंधुओं ने निभाई जातर नवाई की परम्परा*
*देवी देवताओं को भेंटकर चढ़ाई नईं फसल*
(मनोज पुरोहित)
पेटलावद।सनातन संस्कृति की मूल जड़ हैं:_आदिवासी/वनवासी
पेटलावद के गाँव कोदली में आदिवासी समाज में जातर “नवाई” एक पारंपरिक और सांस्कृतिक परंपरा है।“नवाई भील समाज की वह पारंपरिक परंपरा है, जिसमें नई फसल को सबसे पहले अपने देवी देवताओं को चढ़ाया जाता है भील जनजातीय का प्रमुख उत्सव नवाई नई फसलों की उपज का परंपरागत रीति से पूजन कर मनाया जाता है। यह उत्सव नई फसल की अच्छी उपज होने की खुशी में मनाया जाता हैं।
सनातन संस्कृति की मूल जड़ है आदिवासी समाज जिसे गांव का कुलदेवता भी कहा जाता हैं। इस स्थान पर साल भर में सामूहिक सात:_आठ कार्यक्रम होते हैं जैसे:_जातर, सलावनी, उज्जयिनी, नवाई, मांडला, गरबा(मुड़ा) और मान आदि।
झाबुआ जिले में आदिवासी समाज अपनी सभ्यता संस्कृति रीति रिवाज परंपरा को वह आदि अनादि काल से निर्वहन करते आ रहा है वह समय-समय पर देवों की पूजा, ईश्वर की पूजा और खत्रीज की पूजा भी करता है।
सबसे पहले गांव की सावन माता, बाबा खेड़ापति देव, खेड़ा ना खात्रिज, लालबाई, फूलबाई, कसुमर बाबा, हनुमान वीर, भोला ईश्वर, माता शीतला, सहित गांव के स्थानीय देवी देवताओं को नया अनाज चढ़ाने के बाद ही नया अनाज खाया जाता है यह परंपरा आदि आदिकाल से चले आ रहे हैं आदिवासी समाज इस दिन सर्वप्रथम बाबा गणेश के नाम से नारियल फोड़ते हैं और पूजार्चना के बाद अपने पूर्वजों अर्थात खत्रीज की पूजा अर्चना करते हैं साथ में पूर्वजों को देसी दारू की धार डाली जाती है, यह परंपरा आदिवासी अंचल में जातर होने के बाद ही की जाती है नवाई में बहन बेटी हूं और काका बाबा सहित गांव के आसपास के लोगों को बुलाया जाता है और सब सामूहिक मिलकर नवाई का उत्सव मनाते हैं।
आदिवासी समुदाय में खेतों में खड़ी नहीं फसल जैसे ककड़ी, भूटा, भिंडी, चावल, मूंग, ज्वार आदि पूजा अर्चना के बाद घर के बड़ आदिवासी समुदायों और क्षेत्रों में नई फसल को पहले देवताओं/कुलदेवता को अर्पित किया जाता है।परिवार और समाज की समृद्धि व अच्छी फसल के लिए पूजा की जाती है। इसके बाद ही नई फसल को सामूहिक रूप से खाने की परंपरा होती है।पारंपरिक गीत, नृत्य और सामुदायिक मिलन भी कई क्षेत्रों में इसका हिस्सा होते हैं
सामाजिक कार्यकर्ता:_राजेश मैंडा का कहना है यह जातर "नवाई" सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी बोली, संस्कृति, रीति-रिवाज, पूर्वजों की परंपरा है
आदिवासी समाज हर कार्य को करने के पूर्व में बाबा गणेश की आराधना करने के बाद ही शुरू करते हैं वर्तमान समय में कुछ राजनीतिक के चाटुकार आदिवासी समाज को धर्म से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं मैं उनका कहना चाहता हूं आदिवासी समाज सनातन संस्कृति की मूल जड़ है। उसके लिए एक उदाहरण में नवरात्रि के समय हर गांव में गरबे और जवारे में मिलते हैं आदिवासी समाज की पूजा पद्धति और सनातन धर्म की पूजा पद्धति दोनों एक दूसरे को पूरक हैं
एक शुभ संदेश है की हमारी अपनी आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को गर्व के साथ पहुँचाएं और अपनी संस्कृति को सदैव जीवित रखें।
गांव के तड़वी काना मैंडा, गांव के कोटवार हुरसिंह मैड़ा, भड़वा टीटीया मैंड़ा, सुरजी, धीरजी, अक्कू, झुना, हिमचंद, दिलीप, अन्य गांव के वरिष्ठ उपस्थित हुए थें।

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