*घरों के आंगन में गा रही बेटियां संजाबाई के मधुर गीत*
*संजा ,दीवार पर उकेरी बेटियों की आस्था और मालवा निमाड़ की आत्मा*
*एआई ओर हाईटेक युग में लुप्त होती परम्पराओं को बचाकर अगली पीढ़ी को सौंपना हमारी भी जिम्मेदारी*
(मनोज पुरोहित,)
पेटलावद।पितृपक्ष शुरू होते ही पेटलावद-झाबुआ की दीवारें बोलने लगती हैं। गोबर से लिपी-पुती दीवारों पर हर दिन एक नई आकृति उभरती है, फूलों से, पत्तियों से, रंगों से सजी हुई। इसे बनाती हैं हमारी बेटियाँ, और इसका नाम है - *संजा*।
संजा कोई साधारण चित्रकला नहीं, ये मालवा की बेटियों का श्राद्ध पक्ष का 16 दिन का व्रत-पर्व है।
*क्या है संजा?*
बुजुर्ग बताते हैं, संजा शिव-पार्वती की बेटी थी। कुंवारी लड़कियां अच्छे वर और सुखी परिवार के लिए 16 दिन तक रोज शाम को दीवार पर गोबर से संजा बनाती हैं। पहले दिन छोटी संजा, फिर रोज उसमें कुछ जोड़ते जाना - किला, चिड़िया, जहाज, सास-बहू, बाजार-हाट। और हर शाम सहेलियां मिलकर गीत गाती हैं:
_"छोटी सी संजा, छोटा सा हार,_
_भाई की दुल्हन लाएगी संजा का त्यौहार..."_
*पेटलावद की संजा क्यों खास है?*
हमारे यहाँ संजा में मालवा और भील संस्कृति का संगम दिखता है। शहर की लड़कियां रंगों से बनाती हैं तो गाँव की बेटियाँ फूल-पत्ती और अनाज से। अंत में अनंत चतुर्दशी को संजा का विसर्जन होता है, जैसे गणेश जी का। बेटियाँ संजा को विदा करती हैं और मन में कामना करती हैं - अगले साल फिर आना।
*एआई ओर हाईटेक युग में लुप्त होती परम्परा*
आज मोबाइल और इंस्टाग्राम के जमाने में संजा थोड़ी पीछे छूट रही है। पहले हर घर की दीवार पर संजा दिखती थी, अब गिने-चुने घरों में। जरूरत है इसे बचाने की।
इस बार पितृपक्ष में अपनी बेटी, भतीजी, पड़ोस की बच्ची से कहिए - चलो, एक संजा बनाते हैं। गोबर लाओ, फूल लाओ, गीत गाओ। क्योंकि दीवार पर बनी ये संजा सिर्फ चित्र नहीं, हमारी संस्कृति का पासवर्ड है।

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