संघ के शताब्दी वर्ष पर प्रमुखजन गोष्ठी का हुआ पेटलावद में आयोजन*

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संघ के शताब्दी वर्ष पर प्रमुखजन गोष्ठी का हुआ पेटलावद में आयोजन*

 *संघ के शताब्दी वर्ष पर प्रमुखजन गोष्ठी का हुआ पेटलावद में आयोजन*

*राष्ट्र निर्माण की शतकीय यात्रा में संघ का योगदान अतुलनीय — शंभुप्रसाद गिरी**

*पांच (पंच) परिवर्तनों पर दिया जोर*

(मनोज पुरोहित)

 *पेटलावद।* राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने 100 वर्षों की गौरवशाली यात्रा में समाज के हित, संगठन और राष्ट्र निर्माण के लिए निरंतर कार्य किया है। किसी भी संगठन का शताब्दी तक सतत चलना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। संघ ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ की परिकल्पना को साकार करते हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है।

उक्त विचार नगर में आयोजित तीन खंडों की प्रमुखजन गोष्ठी में मुख्य वक्ता शंभुप्रसाद गिरी, अखिल भारतीय सह ग्राम विकास संयोजक, ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों द्वारा भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। सामूहिक गीत अर्जुन आंजना द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर मंच पर खंड संघ चालक रणछोड़ आंजना, भारत सिंह सिसोदिया एवं मगन कटारा उपस्थित रहे।


श्री गिरी ने कहा कि संघ ने अपनी शतकीय यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव एवं प्रतिबंधों का सामना करते हुए भी हिंदू समाज के हित में निरंतर कार्य किया है। समाज में समानता, समरसता और सेवा के भाव को सुदृढ़ करने हेतु ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ के ध्येय वाक्य पर कार्य करते हुए राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

उन्होंने बताया कि समाज में भ्रम फैलाने और विभाजनकारी शक्तियों द्वारा हिंदुओं को बाँटने के अनेक प्रयास हुए हैं, किंतु संघ ने जागरूकता के माध्यम से इन प्रयासों का सशक्त उत्तर दिया है। गौमाता को राष्ट्रमाता का सम्मान दिलाने हेतु संघ द्वारा हस्ताक्षर अभियान चलाकर संरक्षण के प्रयास किए गए हैं। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से गौसेवा और संरक्षण का आह्वान किया।


धर्मांतरण की सक्रिय चुनौतियों का उल्लेख करते हुए श्री गिरी ने कहा कि संगठित और जागरूक समाज ही इन शक्तियों का प्रभावी उत्तर दे सकता है। समाज को एकजुट होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करना होगा।


**पंच परिवर्तन पर विशेष बल**


अपने उद्बोधन में उन्होंने संघ के शताब्दी वर्ष में संचालित ‘पंच परिवर्तन’ अभियान पर विशेष जोर देते हुए कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वअनुशासन, समरसता एवं स्वदेशी आचरण को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इन मूल्यों के माध्यम से सशक्त परिवार, संगठित समाज और आत्मनिर्भर राष्ट्र की परिकल्पना साकार की जा सकती है।


**जिज्ञासाओं का समाधान**

गोष्ठी के द्वितीय सत्र में उपस्थित प्रमुखजनों ने विभिन्न जिज्ञासाएँ एवं प्रश्न रखे, जिनमें समाज की एकात्मता, घर-घर रोटी संग्रह का उद्देश्य, हिंदू की परिभाषा तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय शामिल थे। श्री गिरी ने सभी प्रश्नों का संतोषजनक समाधान प्रस्तुत किया। इस दौरान लगभग 11 से अधिक प्रश्न पूछे गए। कार्यक्रम के अंत में पूर्ण वंदे मातरम का गायन किया गया।


कार्यक्रम में 750 से अधिक समाजजन उपस्थित रहे। जिसमें समाज की विभिन्न श्रेणियां किसान, व्यापारी, शिक्षक, अभिभाषक, डॉक्टर, इंजीनियर, युवा, मातृशक्ति, समाज प्रमुख आदि उपस्थित रहे। स्वयंसेवकों द्वारा संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसका सभी अतिथियों ने अवलोकन किया। कार्यक्रम का संचालन वीरेंद्र भट्ट ने किया।

 



 

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