*अखिल भारतीय संस्कृत भारती अधिवेशन में झाबुआ जिले का हुआ प्रतिनिधित्व*
*संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो विश्व शांति में लिए मुख्य भूमिका निभा सकती है... होसबाले*
(मनोज पुरोहित)
पेटलावद। देववाणी संस्कृत के उत्थान को समर्पित 'अखिल भारतीय संस्कृत भारती अधिवेशन' आज 07 नवम्बर से तमिलनाडु के कोयम्बत्तूर में शुरू हो गया है। यह महाकुंभ दिनांक 9 नवंबर तक चलेगा, जिसमें भारतवर्ष के साथ-साथ 26 से अधिक देशों के लगभग 5,000 (पाँच हजार) प्रतिनिधिगण सहभागिता कर रहे हैं।
इस आयोजन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, अखिल भारतीय संस्कृत भारती के अध्यक्ष गोप बंधु मिश्र, संस्कृत भारती के महामंत्री सत्यनारायण भट्ट, स्वामी तपस्या मृतानंदपुरी, डॉ मणि द्रविड़ शास्त्री, श्रील कामाक्षी दास स्वामी ने
मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद रह कर मार्ग दर्शन दिया।
होसबाले ने अपने उद्बोधन में वदतु संस्कृतम् की व्याख्या की। आपने कहा कि "संस्कृत राष्ट्र भाषा है राज्य भाषा भी होनी ही चाहिए।" संविधान सभा में डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने एकता के लिए प्रस्ताव पारित भी करवाया। लेकिन कुछ कारण थे कि राष्ट्र भाषा राज्य भाषा नहीं हो पाई।
आपने यह भी कहा कि बोली भाषा का स्पष्ट भेद सभी को ज्ञात होना चाहिए। इसी हेतु संस्कृत भारती अथक प्रयास में लगी है। आज यहां अधिवेशन में तीन पीढ़ियों के कार्यकर्तागण एक साथ बैठें हैं। जैसे दादा उनका लड़का और पौत्र,दादी पुत्रवधू और पौत्री उपस्थित है।
संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो विश्व शांति में लिए मुख्य भूमिका निभा सकती है। इसीलिए हम सभी को संस्कृत भाषा में व्यवहार करना और करवाना चाहिए।
*झाबुआ जिले से छ: प्रतिनिधियों ने की सहभागिता*
इस विशाल और महत्वपूर्ण अधिवेशन में मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले से भी छ: प्रतिनिधिगण शामिल हुए हैं, जो जिले में संस्कृत के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
झाबुआ जिले के सहभागिता करने वाले प्रतिनिधिगण में विभाग सहसंयोजक मोहन सिंह डामर, जनपद प्रमुख रामेश्वर गरवाल, पेटलावद विकास खंड प्रमुख विकास कटारा, महिला प्रमुख प्रमिला कटारा,
मेघनगर विकास खंड प्रमुख ईश्वर लाल चौहान, एवं रामा विकास खंड प्रमुख तेरसिंह बिलवाल शामिल है।
*संस्कृत के वैश्विक उत्थान पर मंथन*
यह अधिवेशन संस्कृत को जन-जन तक पहुँचाने और उसे वैश्विक पटल पर स्थापित करने के उद्देश्य से एक बड़ा मंच प्रदान कर रहा है। यहाँ उपस्थित देश-विदेश के प्रतिनिधिगण अपनी योजनाओं, अनुभवों और नवाचारों को साझा करेंगे ताकि देववाणी संस्कृत को एक नई ऊर्जा मिल सके।
इस तीन दिवसीय अधिवेशन में संस्कृत भाषा, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विभिन्न विषयों पर गहन विचार-विमर्श, सत्र और प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाएँगी।
> यह अधिवेशन न सिर्फ संस्कृत के विद्वानों और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर ला रहा है, बल्कि यह भारत की शाश्वत संस्कृति और ज्ञान परंपरा को विश्वभर में फैलाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

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