*श्रुति ज्ञानी के जीवन से दुख व क्लेश चले जाते हैं*.*साध्वी ज्योतिषमति जी*
*तेरापंथ महिला मंडल बना आयंबिल का लाभार्थी*
(मनोज पुरोहित)
पेटलावद।श्रुत ज्ञान से ही हमें सभी समझ व जानकारियां प्राप्त होती है। इसी ज्ञान के माध्यम से आत्मा अपनी उन्नति प्रगति करती है। श्रुत ज्ञान की स्मृति जीवन की सुस्ती हटा देती है। श्रुत ज्ञान से संपन्न आत्मा भाग्यशाली होती है।श्रुत ज्ञानी को रोज अपने ऊपर टिका लिखना चाहिए।ना कि दूसरों पर टीका टिप्पणी करना चाहिए।
उक्त बात साध्वी श्री ज्योतिषमति जी ने श्रुत ज्ञान की व्याख्या करते हुए कहीं। आपने कहा कि श्रुत ज्ञान से संपन्न शीलवान हो जरूरी नहीं है। शील से संपन्न है वह श्रुत ज्ञान से संपन्न हो यह भी जरूरी नहीं है। पर जो श्रुत व शील दोनों से संपन्न है वो शुद्ध ज्ञानी है । शील से व श्रुत ज्ञान दोनों से रहित है वह मिथ्यातवी है । श्रुत ज्ञानी के जीवन से दुख व क्लेश के चले जाते हैं। आगम ज्ञान के सागर में डूबने वाला मोक्ष मोती को पाजाता है। जैसे कुशल तेराक सागर तीर जाता है। कुशल गोताखोर समुद्र से कीमती मोती प्राप्त कर लेता है। श्रुत ज्ञान संसार के सभी स्वरूप व स्वभाव को जानने में सहायक होता है।
साध्वी प्रमिलाजी ने कहा आजकल लोग पाप भी सूटेबल, यूजेबल व फैशनेबल कर रहे हैं। पापों का पूर्णावर्तन कर ते रहे तो जीवन मे परिवर्तन संभव नहीं है। वह तुम्हें संसार मे परिभ्रमण ही करता रहेगा। परिवर्तन एक दिन परी निर्वाण को उपलब्ध करा देगा। पापों को साईड मे करते चले। साधना को स्टेप बाय स्टेप करते चले। व जिनेश्वर की आज्ञा का पालन वन बाय वन करते रहे। तो एक दिन मोक्ष पा जाओगे। ।जैन समाज में औली जी की आराधना चल रही है। प्रथम दिन वर्ण के छह बिना नमक के दो व नमक वाले 53 आयबींल हुए। प्रथम दिन के लाभार्थी तेरापंथ सभा कि महिला मंडल रहा।

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